Posts

रसूलुल्लहा स. की ताईफ से वापसी

Image
रसूलुल्लहा स. ने ताईफ जा कर वहाँ के सरदारों और आम लोगों को दीने हक की दावत दी, मगर वहाँ के लोगों ने इस्लाम कबूल करने के बजाए, रसूलुल्लहा स. की सख्त मुखालफत की गालियाँ दी, पत्थरों से मारा और शहर से बाहार निकाल दिया, पत्थरों की चौट से आप स. के बदन मुबारक से खून जरी हो गया,
शहर से बाहार आकर एक बाग मे रुके, वहाँ हुजूर स. ने अल्लाह तआला से दुआ की और अपनी कमजोरी, बे बसी और लोगों की निगाहों में बे बकअती की फरयाद की और अल्लाह तआला से नुसरत व मदद की दरख्वास्त की और फर्माया : इलाही ! अगर तू मुझ से नाराज नहीं है, तो मुझे किसी की परवाह नहीं, तू मेरे लिये काफी है, इस मौके पर अल्लाह तआला ने पहाडों के फरिश्ते को आप स. के पास भेजा और उस ने आप स. इस की इजाजत चाही के वह उन दोनों पहाडों को मिला दे, जिन के दर्मियान ताइफ का शहर आबाद है, ताके वह लोग कुचल कर हलाक हो जाएँ, मगर हुजूर स. की रहीम व करीम जात ने जवाब दिया : मुझे उम्मीद है के उन की औलाद मे से ऐसे लोग पैदा होंगे, जो एक खुदा की इबादत करेंगे और उस के साथ किसी को शरीक नही ठहराएँगे | हुजूर स. की इस दुआ का असर था के मुहम्मद बिन कासिम जैसे बहादूर नौजवान त…

ताइफ के सरदारों को इस्लाम की दावत

Image
सन १० नबवी में अबू तालिब के इन्तेकाल के बाद कुफ्फारे मक्का ने हुजूर सल. को बहुत जियादा सताना शरू कर दिया,  तो अहले मक्का से मायुस हो कर आप सल. इस खयाल से ताइफ तशरीफ ले गए के अगर ताइफ वालों ने इस्लाम कबूल कर लिया, तो वहाँ इस्लाम के फैलाने की बुनियाद पड जाएगी. ताइफ में बनू सकीफ का खानादन सब से बडा था, उन के सरदार अब्द या लैल, मसऊद और हबीब थे | यह तीनों भाई थे, रसुलूल्लाह सल. ने इन तीनों को इस्लाम की दावत दी, इन में से एक ने कहा : “अच्छा ! अल्लाह ने आप ही को नबी बना कर भेजा है !” दुसरा बोला : “अल्लाह को तुम्हारे सिवा और कोई मिलता ही न था, जिस को नबी बना कर भेजता !” तीसरे ने कहा : “मैं तुझ से बात नही करना चाहता, इस लिये के अगर तू सच्चा रसूल है, तो तेरा इन्कार करना खतरे से खाली नही है और अगर झूटा है तो गुफ्तगू के काबिल नही !” इन सरदारों की इस सख्त गुफ्तगू के बाद थी आप सल. कई रोज तक लोगों को इस्लाम की दावत देते रहे |                  

हुजूर गारे हिरा में Huzur Gare Hira Mein

Image
नुबुव्वत मिलने का वक्त जितना करीब होता गया, उतना ही रसूलुल्लहा स. तन्हाई को जियादा पसन्द करने लगे | सब से अलग हो कर अकेले रहने से अप का बडा सुकून मिलता था | आप अकसर खाने पीने का सामान ले कर कई कई दिन तक मक्का से दूर जाकर “हिरा” नामी पहाड के एक गार में बैठ जाते और इब्राहीम तरीके और अपनी पाकिजा फितरत की रहनुमाई से अल्लाह की इबादत और जिक्र में मश्गुल रहते थे | अल्लाह की कुदरत में गौर व फिक्र करते रहते थे और कौम की बुरी हालत को देख कर बहुत गमजदा रहते थे, जब तक खाना खत्म न होता था, आप शहर वापस नही आते थे | जब मक्का की वादियों से गुजरते तो दरख्तों और पत्थरों से सलाम करने की आवाज आती | आप दाएँ बाएँ और पीछे मूड कर देखते, तो दरख्तों और पत्थरों के सिवा कुछ नजर न आता था | इसी जमाने में आप को ऐसे ख्वाब नजर आने लगे के रात में जो कुछ देखते वही दिन में जाहिर होता था | यही सिलसिला चलता रंहा के नुबुव्वत की घडी आ पहुँची और अल्लाह तआला ने आप को निबुव्वत अता फर्माई |                      

हुजूर सल. का हजरत खदीजा से निकाह Hujur sal. Ka Hajart khadija se nikah

रासूलुल्लाह स. का पहला निकाह मक्का की एक शरीफ खातून खदीजा बिन्ते खुवैलिद से हुआ | हजरत खदीजा एक दौलतमंद बेवा औरत थी | इस से पहले उन की दो शादियाँ हो चुकी थी | उन्होंने हुजूर की अमानत व दियानत और हुस्ने अखलाक जैसी सिफात को देख कर निकाह का पैगाम दिया था, हालाँके इस से पहले कुरैश के बडे बडे सरदारों के पैगाम को ठुकरा चुकी थी | 
हुजूर स. ने इस पैगाम का तजकेरा अपने चचा अबू तालिब से किया, जिस को उन्होंने बखुशी कबूल कर लिया और अबू तालिब बनी हाशीम और मुजर के सरदारों को ले कर हजरत खदीजा के मकान पर गए | अबू तालिब ने निकाह का खुतबा पाढा | उस वक्त हजरत खदीजा की उम्र चालीस साल और अप स. की उम्र शरीफ २५ साल थी | हजरत खदीजा आखरी वक्त तक हुजूर की जाँनिसार और गमख्वार बीवी रही | उन की वफात के बाद भी हुजूर स. उन की खुबियों का तजकेरा करते रहते थे | हजरत इब्राहीम के अलावा आप की सारी औलाद हजरत खदीजा से ही है |          

हूजूर का शाम का पहेला सफर Hujur ka sham ka pahela safar

दादा अब्दुल मुत्तलिब के इन्तेकाल के बाद हुजूर स. अपने चचा अबू तालिब के साथ रहेने लगे | वह अपनी औलाद से जियादा अप स. से मुहब्बत करते थे, जब वह तिजारत की गर्ज से शाम जाने लगे तो आप स. अपने चचा से लिपट गए | अबू तालिब पर इस का बडा असर पडा और आप को सफर मे साथ ले लिया | इस काफले मे शाम पहुँच कर “मकामे बसरा” मे कयाम किया | यहा बुहैरा नामी राहीब रहाता था | जो ईसाय्यत का बडा आलिम था | उस ने देखा के बादल आप पर साय किय हुए है और दरख्त की टहनियाँ आप स. पर झुकी हुई है | फिर उस ने अपनी आदत के बर खिलाफ इस काफले की दावत की | जब लोग दावत में गए, तो आप को कम उम्र होने की वजह से एक दरख्त के पास बैठा दिया | मगर बुहैरा ने आप स. को भी बुलवाया और अपनी गोद में बिठा कर मुहरे नबुव्वत देखने लगा | 
उन्होंने तौरात व इन्जील में आखरी नबी स. से मुतअल्लिक सारी निशनियों को अप के अन्दर मौजूद पाया | फिर अबू तालिब से कहा के तुम्ह्रारा भतीजा आखरी नबी बनने वाला है | इन को मुल्क शाम न लेजाना, वरना यहुदी कत्ल की कोशिश करेंगे इंन्हे वापस ले जाओ और यहुद से इन की हिफाजत करो, चुनान्चे अबू तालिब इस मुख्तसर सी गुफ्तगू के बाद आप स. …

रसूलुल्लाह स.की यतीमी Rasulullh S. ki ytimi

हुजूर स. की पैदाइश से पहले ही वालिद माजिद अब्दुल्लाहा का मदीने में इन्तेकाल हो गया था और आप स. यतीमी की हालत में पैदा हुए, जब उम्र मुबारक छ. साल की हुई, तो वालिदा सय्यिदा आमिना आप को लेकर अपने रिश्तेदारों से मिलने मदीना मुनव्वरा चली गई | वापसी में मकामे अबवा में बीमार हुई और वही इन्तेकाल फर्मा गई | 
अब आप स. अपनी महबूब माँ की शफकत व मुहब्बत से भी महरूम हो गए | उस के बाद दादा अब्दुल मुत्तलिब की शफकत में पले बढे | वह आप को दिल व जान से जियादा चाहते थे, किसी वक्त भी आप से गाफिल नही रहते और काबे के साये में अपने साथ बिठाते थे, जब के खानदान में से किसी और को उन के साथ बैठऩे की हिम्मत नही होती थी | मगर दो साल बाद सिर्फ आठ साल की उम्र में आप के दादा अब्दुल मुत्तलिब भी दुनिया से चल बसे इस तरह यतीम मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह के सर से मुशफिक दादा का साया भी उठ गया | गोया अल्लाह तआला ने दुनिया की तरबियत व परवरिश के सारे असबाब को खत्म कर के खुद अपनी खुसूसी रहमत के तहत आप की तरबियत व निगरानी का इन्तेजाम फर्माया |  

हुजूर की पैदाईश के वक्त दुनिया पर आसर Hujur ki paidaish ke vakt duniya par asar

रसुलल्लाह स. की मुबारक पैदाईश से ५० दिन पहेले असहाबे फील का वाकीआ पेश आया, शाहे यमन अबरहा, हथियों के एक बडे लश्कर को ले कर बैतुल्लाह शरीफ को ढाने के लिये मक्का आया मगर अल्लाह तआला ने उस पुरे लश्कर को तबाह कर के बैतुल्लाह की खुद हिफाजत फर्माई | 
मोअर्रीखीन का बयान है के जिस वक्त हुजूर स. पैदा हुए, ठीक उसी वक्त किसरा के शाही महल में सख्त जलजला आगया और उस के चौदा कन्गुरे गिर गए, इसी तरह फारस के आतिशकदे की आग जो बराबर एक हजार साल से जल रही थी, एक दम से बुझ गई | गोया अल्लाह तआला की तरफ से एक तरह का यह एलान था के अब इस दुनिया में वह हस्ती पैदा हो चुकी है, जिन की अजमत व बुलंदी का चरचा पुरी दुनिया में होगा | जो कुफ्र व शिर्क और गुमराही को खत्म कर के, ईमान व तोहीद का बीज बोएगा और तमाम बुरी आदतों को खत्म करके लोगों को अच्छे अखलाक सिखाएगा और जो किसी एक कौम, काबीला व खान्दान और मुल्क का नही बल्के कयामत तक के लिये पुरी दुनिया का हादी व पैगम्बर होगा |