हजरत हूद की दावत


                      हजरत हूद की दावत
जब कौमे आद शिर्क व बुत परस्ती में हद से बढ गई, तो अल्लाह तआला ने हजरत हूद को नबी बना कर उन की हिदायत के लिये भेजा | उन्होंने कौम के लोगों को तोहीद व इबादते इलाही की दावत दी, शिर्क व बुत परस्ती और लोगों पर जुल्म व जियादती करने से मना किया | कौम ने उन की नसिहत कुबूल करने के बजाए झुटलाना शूरु कर दिया, हजरत हूद ने उन्हें अल्लाह तआला के अजाब से डराया तो वह लोग मजाक उडते हुए कहने लगे के अगर तुम अपनी दावत में सच्चे हो, तो हमारे पास अजाब लेकर आओ अल्लाह तआला ने इस हट धर्मी और मुतालबे पर तीन साल तक कहत साली के अजाब में मुब्तला कर दिया | जिस की वजह से उन के बागात व खेतियाँ सब बरबाद हो गई, इतनी बडी तबही से इबरत हासील करने के बजाए उस बदबख्त कौम की बगावत व सरकशी और जियादा बढ गई, बिलआखिर दोबारा अल्लाह तआला का गजब भडक उठा और एक हप्ते तक चलने वाली तुफानी हवाओ ने उन का नाम व निशान मिटा कर रख दिया | कौमे आद की हलाकत के बाद हजरत हूद अहले ईमान को लेकर यमन के शहर “हजर मौत” चले गए और यहाँ पचास साल तक दावत व तब्लीग का फरीजा अन्जाम देने के बाद ४६४ साल की उम्र में इन्तेकाल फर्माया |                                                                               

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