हजरत इदरीस की दावत

                                 
                    हजरत इदरीस की दावत
हजरत इदरीस जवान हुए तो अल्लाह तआला ने आप को नुबुव्वत से नवाजा और तीस सहीफे नाजिल फर्माए, नुबुव्वत मिळते ही आप ने दावत व तबलीग का काम शुरु कर दिया, 

मुसलसल दावत देने के बावजूद थोडे से लोगों ने ईमान कबूल किया और अक्सर लोग झुटलाने और सताने में लगे रहे, जब लोगों का जुल्म व सितम हद से बढ गया, तो अल्लाह तआला के हुक्म से अहले ईमान को लेकर बाबुल से मिस्र चले गए और दरीयाए नील के किनारे आबाद होगए और आखरी वक्त तक लोगों के दर्मीयान उन्ही की जबान में अल्लाह का पैगाम और दीनी दावात का फरीजा अन्जाम देते रहे | उन की शरीअत और दावात का खुलासा यह था के तौहीद पर ईमान लाओ, आखीरत की नजात के लिये अच्छे अमल करो, तमाम कामों में अदल व इन्साफ करो, अय्यामे बीज के रोजे रखो, जकात अदा करो, नशा आवर चीजों से परहेज करो, शरीअत के मुताबिक अल्लाह की इबादत करो वगैरह | वह आखरी वक्त तक लोगों को दीन की दावत और अच्छे कामों की नसीहत करते की हुए तीन सौ पैंसठ साल की उम्र में अपने खालिके हकीकी के दरबार में पहुँच गए |                                 

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